₹370 का सौदा और तालियों की गूँज: आखिर यह सोच आती कहाँ से है?
₹370 की बिरयानी के बदले पैसे वसूलने वाला बयान और उस पर हस्ती भीड़, समाज में 'सहमति' (Consent) को लेकर सड़ी हुई और स्त्री-विरोधी (Misogynistic) मानसिकता को उजागर करती है। यह घटना दर्शाती है कि कैसे औरतों को उपभोग की वस्तु समझा जाता है, जिसे 'डार्क कॉमेडी' के नाम पर नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए।₹370 का सौदा और तालियों की गूँज: आखिर यह सोच आती कहाँ से है?जब एक २२ साल का लड़का भरे शो में, हाथ में माइक लेकर बड़े गर्व से कहता है—"मैंने ₹370 की बिरयानी खिलाई, तो सोचा पैसे वसूल करके ही छोड़ूँगा..." और सामने बैठी सैकड़ों लोगों की भीड़ इस पर ठहाके मार कर तालियाँ बजाने लगती है... तो यकीन मानिए, उस वक्त सिर्फ एक लड़की की सुरक्षा दांव पर नहीं होती, बल्कि पूरे समाज की इंसानियत का दम घुट रहा होता है।यह घटना सिर्फ एक 'मूर्खतापूर्ण बयान' नहीं है। यह हमारे समाज की उस गहरी, सड़ी हुई बीमारी का एक्स-रे है, जिसे हम अक्सर 'डार्क कॉमेडी' या 'लड़कों की आपसी बातें' कहकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।यह हिम्मत आती कहाँ से है?यह हिम्मत रातों-रात पैदा नहीं होती। इसे पाल-पोसकर बड़ा करता है हमारा समाज। यह हिम्मत तब आती है जब लड़कों को बचपन से सिखाया जाता है कि दुनिया की हर चीज़—यहाँ तक कि एक औरत की मर्ज़ी, उसकी इज़्ज़त और उसकी 'सहमति' (Consent)—भी एक कीमत पर खरीदी जा सकती है। उनके लिए ₹370 का बिल कोई खाना नहीं, बल्कि एक 'कागज़ी कॉन्ट्रैक्ट' बन जाता है, जिसके बदले उन्हें लड़की के आत्मसम्मान का सौदा करने का हक मिल जाता है।सबसे डरावनी बात: वो हंसती हुई भीड़उस लड़के की नीच सोच से भी ज़्यादा डरावनी वो गूँजती हुई तालियाँ थीं। जो लोग वहाँ बैठकर हंस रहे थे, वे सिर्फ दर्शक नहीं थे; वे उस हिंसक और स्त्री-विरोधी (Misogynistic) मानसिकता के सह-अपराधी थे। जब हम ऐसी ओछी बातों पर हंसते हैं, तो हम आने वाले कल के अपराधियों की पीठ थपथपा रहे होते हैं। हम उन्हें भरोसा दिला रहे होते हैं कि "तुम सड़कों पर, अंधेरे पार्कों में लड़कियों के साथ जो मर्ज़ी करो, समाज तुम्हारे चुटकुलों पर हंसता रहेगा।"अब चुप रहने का वक्त नहीं हैयह वक्त लड़कियों को यह सिखाने का नहीं है कि वे अपनी सुरक्षा कैसे करें या डेट पर बिल कैसे स्प्लिट करें। यह वक्त लड़कों के उस 'कम्फर्ट ज़ोन' को तोड़ने का है जहाँ वे औरतों को एक उपभोग की वस्तु समझते हैं।जब तक हम ऐसे 'मर्दों' को पब्लिक में टोकना शुरू नहीं करेंगे, जब तक हम स्टैंड-अप शोज़ में ऐसी बकवास पर तालियाँ बजाना बंद नहीं करेंगे, तब तक कोई भी सड़क, कोई भी कैफे और कोई भी शहर हमारी बहनों और बेटियों के लिए सुरक्षित नहीं हो सकता।याद रखिए: सहमति (Consent) बिकाऊ नहीं होती। न ₹370 में, न ३७ लाख में।
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